गाजीपुर में परम्परागत पेशा पर आश्रित बाँसफोर समुदाय : संघर्ष, श्रम और सामाजिक यथार्थ
लेखक- राजकपूर रावत पत्रकार

पूर्वांचल के जनपद गाजीपुर की सामाजिक संरचना में अनेक श्रमशील समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्हीं समुदायों में एक प्रमुख नाम है बाँसफोर समुदाय का। यह समुदाय सदियों से बाँस आधारित परम्परागत पेशों पर आश्रित रहा है। ग्रामीण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही, किन्तु विडम्बना यह है कि समाज को उपयोगी वस्तुएँ उपलब्ध कराने वाला यह समुदाय स्वयं सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक दृष्टि से अत्यधिक पिछड़ेपन का शिकार बना रहा।
“बाँसफोर” शब्द का सीधा सम्बन्ध बाँस से है। यह समुदाय मुख्यतः बाँस को काटने, छीलने, बुनने तथा उससे विभिन्न घरेलू एवं कृषि उपयोगी वस्तुएँ बनाने का कार्य करता रहा है। गाजीपुर जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों तक बाँसफोर समुदाय द्वारा निर्मित सूप, डलिया, टोकरी, दौरी, चटाई, मछली पकड़ने के उपकरण तथा कृषि कार्यों में प्रयुक्त सामग्री व्यापक रूप से उपयोग में लाई जाती रही।

विशेष रूप से जनपद के ग्रामीण इलाकों — सैदपुर, जखनियां, मुहम्मदाबाद, जमानियां तथा करण्डा क्षेत्र आदि में इस समुदाय की उपस्थिति देखने को मिलती है। गाँवों की पारम्परिक अर्थव्यवस्था में बाँसफोर परिवारों का श्रम एक अनिवार्य हिस्सा हुआ करता था।
आधुनिक प्लास्टिक एवं फैक्ट्री निर्मित सामानों के आने से पहले ग्रामीण जीवन लगभग पूर्णतः स्थानीय कारीगरों पर आधारित था। उस समय बाँसफोर समुदाय किसानों, मजदूरों एवं आम ग्रामीण परिवारों की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करता था। फसल कटाई, अनाज रखने, पशुपालन तथा घरेलू कार्यों में बाँस से बने उपकरणों का व्यापक उपयोग होता था।
यह समुदाय केवल वस्तुएँ बनाकर बेचता ही नहीं था, बल्कि गाँवों की पारस्परिक सामाजिक व्यवस्था का भी एक अभिन्न अंग था। कई स्थानों पर यह कार्य वस्तु विनिमय प्रणाली के माध्यम से भी चलता था, जहाँ फसल के मौसम में अनाज के बदले बाँस के सामान दिए जाते थे।
समय के साथ प्लास्टिक उद्योग, मशीन आधारित उत्पादन तथा बाजारवादी संस्कृति ने बाँस आधारित हस्तशिल्प को गंभीर रूप से प्रभावित किया। सस्ते प्लास्टिक के सामानों ने बाँसफोर समुदाय के परम्परागत रोजगार को लगभग समाप्ति की स्थिति में पहुँचा दिया।
गाजीपुर में आज अनेक बाँसफोर परिवार ऐसे हैं जो अपने पारम्परिक पेशे को छोड़कर दिहाड़ी मजदूरी, ईंट-भट्ठों पर कार्य, रिक्शा चलाने अथवा छोटे-मोटे असंगठित कार्यों की ओर मजबूर हुए हैं। जिन परिवारों ने अभी भी यह पेशा बचाकर रखा है, उन्हें पर्याप्त बाजार, पूँजी एवं सरकारी सहयोग का अभाव झेलना पड़ रहा है।
बाँसफोर समुदाय सामाजिक रूप से भी लंबे समय तक उपेक्षा एवं भेदभाव का सामना करता रहा है। आर्थिक कमजोरी के कारण शिक्षा तक पहुँच सीमित रही, जिसके परिणामस्वरूप सरकारी नौकरियों एवं मुख्यधारा के अवसरों में उनकी भागीदारी अत्यंत कम दिखाई देती है।
गाजीपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक परिवार ऐसे मिल जाते हैं जहाँ बच्चों की शिक्षा आर्थिक संकट के कारण बाधित हो जाती है। बाल श्रम, अस्थायी मजदूरी एवं सामाजिक असुरक्षा जैसी समस्याएँ इस समुदाय के विकास में बड़ी बाधा बनी हुई है।
सरकार द्वारा अनुसूचित जातियों एवं पारम्परिक कारीगर समुदायों के लिए1 विभिन्न योजनाएँ संचालित की जाती हैं, किन्तु जमीनी स्तर पर इनका लाभ सीमित मात्रा में ही पहुँच पाता है। बाँस आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने, हस्तशिल्प प्रशिक्षण, स्वरोजगार ऋण एवं विपणन सुविधाओं की आवश्यकता आज भी महसूस की जा रही है।
यदि गाजीपुर में बाँसफोर समुदाय के पारम्परिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए, ई-कॉमर्स, हस्तशिल्प मेले तथा सहकारी समितियों के माध्यम से इनके उत्पादों को प्रोत्साहित किया जाए, तो यह समुदाय आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकता है।
बाँसफोर समुदाय केवल श्रमिक समुदाय नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति का संवाहक भी है। इनके हस्तनिर्मित उत्पादों में लोक कला, परम्परा एवं प्रकृति से जुड़ी जीवन शैली की झलक दिखाई देती है। आज जब पर्यावरण संरक्षण एवं प्लास्टिक मुक्त जीवन की चर्चा बढ़ रही है, तब बाँस आधारित उत्पाद पुनः महत्वपूर्ण बन सकते हैं।
गाजीपुर का बाँसफोर समुदाय श्रम, कौशल एवं संघर्ष का प्रतीक है। यह समुदाय सदियों से समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहा, लेकिन स्वयं विकास की मुख्यधारा से दूर रह गया। आवश्यकता इस बात की है कि इनके पारम्परिक ज्ञान एवं हस्तकला को केवल “पुराना पेशा” मानकर उपेक्षित न किया जाए, बल्कि इसे रोजगार, पर्यावरण एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर पुनर्जीवित किया जाए।
जब तक श्रमशील समुदायों को सम्मान, शिक्षा, संसाधन एवं अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक सामाजिक समानता की कल्पना अधूरी रहेगी। गाजीपुर के बाँसफोर समुदाय का प्रश्न केवल एक जाति विशेष का प्रश्न नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के पारम्परिक श्रम और उसके सम्मान का भी प्रश्न है।
लेखक- राजकपूर रावत
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